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आज हम आपके लिए लाए मेरे पसंदीदा लेखकों मैं से एक जिनकी अभी तक केवल दो ही किताबे प्रकाशित हुई है फिर भी उन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी छाप छोड़ी है। हम बात कर रहे है आह्वान और स्तुति ( STUTI : MAHABHARAT KE PAURANIK RAHASYA) के लेखक सौरभ कुदेशिया जी की और आज हम उनकी दूसरी किताब स्तुति की समीक्षा करेंगे जो एक मायथोलॉजी फिक्शन उपन्यास है जो उनकी प्रथम किताब आह्वान का ही दूसरा खंड है । स्तुति के पढ़ने के बाद एक बात तो मैं अवश्य बोलूंगा की सौरभ जी की लेखनी अमिश की लेखनी को टक्कर दे रही है । इस किताब के जो युद्ध दृश्य जिस तरह लिखे है o my god वाली फीलिंग आ जाएगी किसी हॉलीवुड की फ़िल्म देख रहे हो ऐसा लगेगा ।

आज हम इस किताब की समीक्षा कुछ अलग तरीके से करने वाले है आज हम इसे उपन्यास कला के तत्व के आधार पर इसकी समीक्षा करेंगे। उपन्यास कला के 6 तत्व माने गए

1. कथावस्तु। 4. वातारण काल

2.चरित्र चित्रण 5. भाषा

3.संवाद। 6. उद्देश्य

कथावस्तु

सबसे पहला तत्व है कथावस्तु स्तुति की कथावस्तु से शुरुआत में मैं थोड़ा निराश अवश्य हुआ क्योकि मुझे लगा कि आह्वान के जो रहस्य है वो पता चलेंगे और आगे की कहानी स्तुति में आगे बढ़ेगी पर यहाँ तो एक और कहानी जुड़ रही है आह्वान में रोहन कुलश्रेष्ठ जो पांडुलिपी वसीयत में छोड़कर गए थे उसी पांडुलिपि की कथा ही पूरे उपन्यास की कथा है । पर जैसी ही मैंने आगे पढ़ता गया तो बस पढ़ता ही रहा एक के बाद एक घटना पाठकों को किताब पढ़ने के लिए इस कदर मजबूर करती है कि किताब समाप्त होने तक आप इसे छोड़ेंगे नही समाप्त होने पर भी यही सोचेंगे कि यह समाप्त क्यो हुई। मैं तो बस इसके तीसरे भाग का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूँ।

चरित्र चित्रण

नया कथानक जुड़ने से कहानी में पुराने पात्र के साथ कई नए पात्र की भी एंट्री हुई है आह्वान के इंस्पेक्टर जयंत, डॉ मजूमदार, विक्रम, श्रीमंत जी के साथ साथ नए पात्र में शोण, शरणया, आचार्य रुद्र , श्री कृष्ण , तक्षक, गरुड़ , शिव ,महाराज अधिराज आदि आदि । स्तुति उपन्यास का नायक पात्र शोण ही है। शोण जैसे पात्र के लिए एक बात अवश्य कहना चाहूंगा कि महाकाव्य का एक लक्षण होता है कि उसका नायक सदश्य क्षत्रिय हो और उसका चरित्र धीरोदत गुणों से अर्थात महासत्व, अत्यंत गंभीर, क्षमावान, निगूढ़, दढव्रत, अहंकारवान, स्थिर चरित्र आदि गुण होते यही सभी गुण स्तुति के नायक शोण में मौजूद है अब बात करते है शरण्या की जो वर्ग प्रतिनिधि पात्र जो विसर्पी के दुख के माध्यम से दलित शोषण की समस्या को उजागर करती है । और भी कई पात्र है जिसके साथ लेखक ने सही तरीके से न्याय किया है।

संवाद

उपन्यास का तीसरा मुख्य तत्व है संवाद । संवाद के मुख्य दो कार्य होते है प्रथम तो उपन्यास को गति देना और दूसरा पात्र की विशेषता को पाठक के सामने उजागर करना स्तुति में यह दोनों कार्य के लिए संवाद का कार्य किया गया है । शोण के जितने भी संवाद है वह संवाद नही बल्कि लेखक की सोच को उजागर करता है उनकी फिलॉसफी को हमारे सामने रखता है। स्तुति के संवाद पाठको का मन मोह लेंगे। वही संवाद ने ही उपन्यास की कथा को गति दी एक ही दृश्य तीस चालीस पृष्ठ तक संवादो के माध्यम से ही लिखा है। मेरा फ़ेवरिट संवाद श्री कृष्ण औऱ महादेव की बीच हुआ संवाद है ।

वातारवरण काल

उपन्यास का चौथा महत्वपूर्ण तत्व है वातावरण काल है वातारण काल से तात्पर्य है उपन्यास की कथा किस समय में चल रही है । स्तुति के कथा के दो काल है प्रथम है आज का समय जो 2010 कि कथा है जो आह्वान उपन्यास में भी थी और दूसरा काल जो मुख्य है वह महाभारत के समय का है । जहाँ शोण और महाभारत के युद्ध के साथ जुड़ी हुई कहानी है। वही पर लेखक ने भी प्रकृति वर्णन और उस समय के जीवन को बहुत ही अच्छी तरह से दिखाया है।

भाषा

स्तुति की भाषा थोड़ी जटिल है क्योंकि इसमें ज्यादातर संस्कृतनिष्ठ हिंदी का उपयोग किया गया है और मेरे हिसाब से यह सही भी है क्योंकि इसकी कथा महाभारत काल की है तो भाषा मे जटिलता होनी ही थी हाँ लेखक ने कही जगह कठिन शब्दो के सरल पर्याय शब्द दिए है तो उतनी कठिनाई नही होगी पर हा जितने अभी अभी पढ़ना शुरू किया है शायद उनके लिए इस किताब की भाषा थोड़ी जटिल रहेगी।

उद्देश्य

हिंदी और संस्कृत आलोचकों का मानना है कि हर रचना का कोई न कोई उद्देश्य जरूर होना चाहिए जो समाज को प्रेरणा या समाज की समस्या को उजागर करे पर मेरे हिसाब से उपन्यास जैसी शैली में मनोरंजन का माध्यम अधिक होना चाहिए और स्तुति भी इसमें सफल रही है पर लेखक ने इस उपन्यास में भी सामाजिक समस्या को छुआ है जिनमे प्रथम विसर्पी की समस्या असल मे दलित समस्या को उजागर करती है वही आधुनिक शिक्षण की भी समस्या के बारे मे आचार्य रुद्र एवं उनकी पत्नी के बीच के संवाद में देखने को मिलती है।

समापन

उपयुक्त सभी तत्व पर खरी उतरने के बाद हम कह सकते है सौरभ कुदेशिया जी ने स्तुति के रूप में श्रेष्ठ उपन्यास की रचना की है मेरी खुद की बात करूं तो इस के युद्ध वर्णन हॉलीवुड फिल्म के दृश्य समान है जो मुझे भीतर तक रोमांचित कर गए। आह्वान की तरह यह किताब भी मेरी द्वारा पढ़ी गई श्रेष्ठ किताब की सूची में अपना स्थान बना चुकी है। लेखक सौरभ जी एवम हिंदी युग्म को तहे दिल से धन्यवाद करना चाहूंगा कि हिंदी साहित्य को स्तुति जैसी धरोहर भेट दी एवम आहुति की प्रतीक्षा रहेगी ।

– आर्यन सुवाड़ा

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