Musafir Hindi

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थी हकीकत कभी मगर अभी बिखर रही है,
किसी साये की तरह सामने से गुजर रही है।

नशे में थी जैसे पलके मेरी ज़माने से,
खुमारी अब चढ़ी थी जो उतर रही है।

यूंही रहने दो अँधेरा जीवन के मोड़ पर,
मेरी किस्मत में नही कोई अब सहर रही है।

सामने थे जो आँखो के पल वो अब नही,
बन के यादे वो ही दिल आज कुतर रही है।

चुप है लब मेरे ये आज तो क्या हुआ ‘राधेय’
कलम से बन के लब्ज़ कोई गजल निखार रहे है।

One thought on “रही है…

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