Musafir hindi

किताबो का सफरनामा

सबसे पहले तो आप सभी को विश्व पुस्तक दिन International books day की हार्दिक शुभकामनाएँ ! मेरे जीवन में पुस्तको का बहुत ही बड़ा योगदान रहा यू कहु तो किताबे ही मेरा प्रथम प्रेम रहा। बचपन से ही पढ़ने लिखने का शोख रहा था पर आर्थिक स्तिथि के कारण किताबे या कॉमिक पढ़ने का बचपन मे मौका प्राप्त ही नही होता था। वही घर मे पढ़ाई के अलावा अन्य किताबो को खरीदना फिजूल खर्ची माना जाता था।

हमारा गाँव बेहद छोटा सा है तो वहां लाइब्रेरी नही थी और स्कूल में भी इसका अभाव था। पर पढ़ने की ललक थी हमे आज भी याद है कि परचून की दुकान में हम कोई चीज लेने जाते तो वह कोई पुराने अखबार या पत्रिका का पन्ना उस चीज को बांधकर देता और हम घर आकर उसका सामान माँ को थमाते और वह पन्ना पढ़ते थे।

हमे कहानियाँ पढ़ना अधिक पसंद था पर कहानियों की किताबें तो खरीद न पाते थे इसलिए स्कूल के हिंदी, गुजराती, इंग्लिश की पाठ्यपुस्तक की किताबें पढ़ते क्योकि उसमे कहानियां पढ़ने को मिल जाती। पर एक समय बाद वो कहानियां भी खत्म हो जाती। हाँ, कई बार एक कहानी दो से तीन बार पढ़ लेता। पर फिर एक ही कहानी उबाव करती इसलिए हमने अपने सीनियर से यह तीनों भाषा की पाठ्यपुस्तक मांगकर पढ़ते थे। तो मेरी पहली किताबे पाठ्यपुस्तक ही रही।

अगर आप कुछ तय करे और उनपर कार्य करे तो प्रकृति भी उस कार्य को सफल बनाने मे प्रयास करती है। हमारे नानी और मम्मी दूसरों के घरों में काम किया करते थे तो वहाँ से हर पांच छ महीने में घर मालिक अखबार और गल्प साहित्य की कुछ किताबे पस्ती के रूप मे दे दिया करते और मैं उनमे से कुछ किताबें छाँटकर मांग लेता और मुझे इस शर्त पर किताबे मिलती की पढ़ने के बाद उसे वापिस दे देनी है जिसे मम्मी और नानी पस्ती में बेच सके और मैं सहमत हो जाता था। इस तरह सुरेन्द्र मोहन पाठक, केशव पंडित, रीमा भारती, वेद प्रकाश शर्मा मनोज आदि आदि को पढ़ने का मौका मिला।

इसी बीच हमने नवोदय की प्रवेश परीक्षा उर्तीण कर ली और पहुँच गए जवाहर नवोदय विद्यालय जामनगर और वहाँ पहली बार हमने सही मायनों में लाइब्रेरी देखी। हजारो किताबे हिंदी की, गुजराती की, इंग्लिश की , इनसाइक्लोपीडिया, गिनिस बुक , और 4 भाषा के अखबार आदि आदि और बस फिर क्या था हम कूद पड़े पुस्तक के सफर में सबसे पहले अपने अंदर के बाल पाठक को संतोष करने के लिए बाल साहित्य पढ़ना शुरू कर दिया। चंदामामा, बाल सम्राट, चंपक डाइजेस्ट, हातिम, अरेबियन नाईट, हितोप्रदेश आदि।

8वी क्लास में पहली बार मुलाकात हुई हिंदी के उपन्यास सम्राट प्रेमचंद जी और बंगला साहित्य के मशहूर लेखक शरतचंद्र जी से और उनके साहित्य में रम सा गया। मानसरोवर 1 से 4 भाग और उनके दो तीन उपनयास पढ़े वही शरत जी की श्रीकांत देवदास और उनकी लघु कहानियों को पढ़ने का मौका प्राप्त हुआ। फिर तो जेरोम के जेरोम, ओ हेनरी, लियो टॉलस्टॉय, महात्मा गांधी, दिनकर, भारतेन्दु, अमृता प्रीतम , प्रेमचंद, धर्मवीर भारती आदि आदि पढ़ने को मिली।

12वी तक आते आते 300 से अधिक किताबे पढ़ डाली और फिर जमाने की रेस में मैं भी भागने लगा। किताबे कही छुटसी गई बीच बीच मे कोई किताब आ भी जाती पर पहले वाली बात नही थी और अगले वर्ष कोरोना आया सबकुछ थम सा गया जिस जमाने की भीड़ के साथ भाग रहा था वह रुक सी गई। शुरुआत में टीवी मोबाइल फिल्मे देखी पर दिल न लगा। किताबे फिरसे पुकार रही थी बचपन की सारी पुरानी यादें आँखों के सामने आ गई। और उसी पल मैंने तय किया कि अपना 1 हजार पुस्तकों का निजी पुस्तकालय बनाऊंगा और मैंने किताबे बसाना शुरू की मालूम है कि 1 हजार बहुत बड़ी संख्या है पर मुझे पढ़नी है। मेरी किताबो को देखकर नानी माँ ने एक बार कहा था कि इतनी सारी किताबो को पढ़ने के बाद क्या करेगा ? मैंने केवल इतना कहा था की मैं इसे अपनी आनी वाली पीढ़ी को दूँगा। और उन्होंने मुझे इस तरह देखा मानो अपनी आँखों से मुझे मूर्ख कह रहे हो।
-आर्यन सुवाड़ा

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2 thoughts on “किताबे ही मेरी दुनिया

  1. आपके साहित्यिक प्रेम और जज्बे को सलाम

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