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पुस्तक शीर्षक: आह्वान

लेखक : सौरभ कुदेशिया

प्रकाशन : हिंदी युग्म

मूल्य :200

हेलो दोस्तों! आज इस पुस्तक की समीक्षा करने से पहले यह बताना चाहता हूँ कि इस पुस्तक की समीक्षा केवल पाठक के रूप मे नही अपितु एक प्रशंसक के रूप मे भी करने जा रहा हूँ। अगर आप भी उन लोगों में से एक है जो यह कहते है कि हिंदी साहित्य में वो बात नही है जो पश्चिमी साहित्य में है तो मेरी आपको खुली चुनौती है की एक बार यह किताब अवश्य पढ़िए, आप अपनी सोच को कोसने लगेंगे। में यह कबूल करना चाहता हूँ की दो वर्ष पूर्व मैंने स्वयं मूल हिंदी किताबो को छोड़ अनुदित किताबो की तरफ रुख कर लिया थस क्योकि हिंदी के ज्यादातर उपन्यास सामाजिक ज्यादा और मनोरंजन का स्तर कम होने लगा था और रक ही प्रकार के उपन्यास से ऊब सा गया था, पर इस किताब ने मेरी सारी धारणा को गलत साबित किया है। आज तक मेरे द्वारा हिंदी साहित्य में रहस्यमय श्रेणी मैं पढ़ी गई आह्वान प्रथम क्रमांक पर है ।

अब बात करते है किताब और उसके लेखक की आह्वान सौरभ कुदेशिया जी द्वारा लिखा हुआ मास्टरपीस हैं। भाई किताब के हर एक पन्ने पर कौन रहस्य डालता है? पाठक एक बार इसे हाथ मे ले और पढ़ना शुरू करे तो इसे समाप्त करके ही छोड़ेगा। आह्वान सौरभ कुदेशिया जीवक प्रथम उपन्यास है। एक और मजेदार बात यह है इस उपन्यास में उनकी 10 वर्ष की मेहनत लगी है जो इसके हर एक पन्ने पर साफ देखने को मिलती हैं और दस वर्ष इस किताब को देना सैलूट है सर।

अब बात करते है इसके कथानक पर तो उपन्यास की शुरुआत होती है रोहन कुलश्रेष्ठ के एक्सीडेंट और उसके मृत्यु के बाद छोड़ी गई वसीयत से। उसका परम् मित्र इंस्पेक्टर जयंत जब एक्सीडेंट की जांच करता है तब साधारण सा लगने वाला एक्सीडेंट और वसीयत असाधारण रूप लेकर कई सारे रहस्य से गिर जाती है। जिसका संबंध 350 वर्ष पूर्व पांडुलिपी से जुड़ा है। जैसे मुख्य पृष्ट पर ही लिखा है विचित्र लाशें और हत्या पाठको के दिमागी शेरलॉक को भी मात देगी। और भी कई सारी कथा की परतें है जो उपन्यास को रोचक और रहस्यमय बनाता है। खण्ड में विभाजित होने से आह्वान में कई सारे पात्र है इंस्पेक्टर जयंत ,विराट, श्रीमंत जी, प्रियंका, डॉ मजूमदार आदि आदि। मेरा मन पसंदीदा पात्र डॉ मजूमदार है। वह जब भी कहानी में आते है तब आपके चेहरे पर मुस्कान और अपनी छाप छोड़कर जाते है।

अंत मे बस इतना कहना चाहूँगा की आह्वान मेरी फेवरिट उपन्यास की लिस्ट में शामिल हो चुकी है और सौरभ कुदेशिया जी और हिंदी युग्म को बधाई जिन्होंने हिंदी साहित्य को आह्वान जैसी धरोहर भेट की ।

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